वीरवर कल्लाजी राठौर
मित्रों आज हम एक ऐसी दिव्य आत्मा का इतिहास आपको बताने जा रहे हैं, धर्म की रक्षा के लिए मारना व मिटना इनके खून में था ,राष्ट्रभक्ति वा धर्म के प्रति समर्पण इनके कूट - कूट कर भरा था। जिनका बलिदान भारतीय इतिहास में अमर हो गया है
जिनके बलिदान और शौर्य के स्मरण मात्र से ही हमारे हृदय में राष्ट्र भक्ति वा सनातन धर्म की रक्षा के लिए लहू में गर्मी आ जाती है।
हम बात कर रहे हैं वीर कल्याण सिंह मेड़तिया राठौर जी की जिनको इतिहास में वीरवर कल्लाजी राठौर के नाम से जानते हैं। कल्लाजी राठौर एक ऐसा नाम है जिनकी गाथाओं का बखान हर सनातनी हिन्दू को अपने परिवार में अवश्य करना चाहिए। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को ज्ञात रहे कि वे कितने महान योद्धाओं कि संतान हैं ।
कल्लाजी राठौर का जन्म कब हुआ था .??
वीरवर कल्लाजी राठौर का जन्म विक्रम संवत 1601, अश्विन मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राजस्थान प्रांत के नागौर जिले के मेड़ता नगर के राजपरिवार में हुआ था , इनके पिताजी का नाम "आस सिंह" और माता जी का नाम "श्वेत कंवर" था । मेड़ता रियासत के राव जयमल राठौर के छोटे भाई थे।
एक बड़ा ही सुन्दर संयोग है, की मीरा बाई(कृष्ण भक्त) कल्लाजी राठौर की बुआ लगती थी।
वीरवर जयमल मेड़तिया जी इनके काका श्री(ताऊजी) थे...!!
कल्लाजी राठौर कल्लाजी वेदों में ,चिकित्सा शास्त्र और योगाभ्यास में निपुण थे , योग की शिक्षा इन्होंने अपने गुरु भैरवनाथ जी से ली थी।
भारतीय इतिहास का वो युद्ध जो वीरों के लिए भी मिसाल है, जिसमे एक सनातनी वीर हिन्दू अपनी मातृभूमि के लिए शीश के धड़ से अलग होने के बाद भी लड़ता रहा.....!!!
चित्तौड़ का युद्ध
यह बात सन् 1567-1568 की है, अकबर ने चित्तौड़ को फतह करने के लिए 60,000 सैनिकों की सेना को रवाना कर दिया था । उस समय चित्तौड़ के शासक महाराणा उदय सिंह जी थे जोकि महाराणा प्रताप के पिताजी थे।
जयमल राठौर जी महाराणा उदय सिंह के सेना नायक थे।
युद्ध से पहले महाराणा उदय सिंह जी को मेवाड़ के तत्कालीन सामंतो ने मेवाड़ के हित में आग्रह करके युद्ध करने से मना कर दिया, क्यूंकि उदय सिंह जी को कुंभलगढ़ में सेना मजबूत करनी थी । अतः उनको काफी समझा बुझा कर कुंभलगढ़ बुला लिया गया ।
उदयसिंह जी ने फैसला किया कि मेड़ता के दुधाजी के पोते वीरों के वीर जयमल मेड़तिया जी को चित्तौड़ का सेनापति बना दिया जाए और उनके साले पत्ताजी चूंडावत को उनके साथ नियुक्त किया। इसी के पश्चात वीर शिरोमणि जयमल जी और वीर कल्लाजी राठौर अन्य वीर राजपूतों के साथ मेड़ता से चित्तौड़ के लिए रवाना हो गए।
जयमल जी और वीर कल्लाजी जी अपनी 8000 सैनिकों के साथ चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश कर गए, वे अंदर से लोगो को सुरक्षित निकाल ही रहे थे। की, तभी उनको सूचना मिली कि अकबर की सेना ने दुर्ग से 10 किलोमीटर दूर ही डेरा जमा लिया है, और चित्तौड़ दुर्ग को चारो ओर से घेर लिया है।
सूचना मिलते ही ,राव जयमल ने दुर्ग के सभी 9 दरवाजे बंद करवा दिए । अकबर की सेना अब दुर्ग के अंदर घुसने का प्रयास करना शुरू कर चुकी थी, अकबर की सेना ने दुर्ग की दीवारों पर तोप से गोल छोड़ना शुरू कर दिया था, परन्तु दुर्ग की दीवार इतनी मजबूत थी कि, वे बार बार असफल ही हो रहे थे । अकबर की सेना जैसे ही दीवार को तोप के गोलों के धमाके से गिरने का प्रयास करती, अंदर जयमल जी के अगुवाई में राजपूतों की सेना तुरंत इस दीवार की मरम्मत करके फिरसे बना लेती, ऐसा ही कई दिनों, फिर हफ्तों और ऐसे ही 5 महीनों तक चलता रहा ।
जब जयमल जी हुए घायल।
एक रात जयमल जी दीवार की मरम्मत मशाल हाथ में लेकर करवा रहे थे, की तभी नीचे से अकबर ने देखा और अपनी संग्राम नामक बंदूक से उनपर निशाना लगाकर गोली चला दी और गोली सीधा जयमल जी की जांघ में लगी।
इससे घायल जयमल जी चलने फिरने में भी अत्यधिक कठिनाई का सामना करने लगे जिससे वे युद्ध में लड़ने में असमर्थ हो गए। परन्तु जयमल जी में युद्ध करने की तीव्र इच्छा थी, और वे युद्ध में ही वीरगति पाना चाहते थे।
चूंकि चित्तौड़ दुर्ग के अंदर राशन और गोला बारूद भी खत्म होने को था। तो सभी राजपूत और राजपुतानियों ने दुश्मन सेना का बढ़ता दवाब देख कर और अंदर राशन खत्म होता देख कर जौहर और शाका का निश्चय किया ।
युद्ध का दिन ।
24 फरवरी 1568 को चित्तौड़ दुर्ग के अंदर सभी राजपूत स्त्रियों ने अपने शरीर पर चंदन का लेप लगा कर और गंगाजल का पान करके अपने प्रियजनों से अंतिम बार मिलकर ,श्रीमद् भागवत गीता का पाठ सुनकर अपने बलिदान का और राजपूत होने का परिचय देते हुए जौहर की अग्नि में बैठ कर हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु, पवित्र अग्नि में अपने प्राणों को त्याग दिया । और सभी क्षत्रिय वीर बांकुरों ने केसरिया वस्त्र धारण कर ( राजपूतों में युद्ध से पहले केसरिया बाना धारण करने का अर्थ है के वे युद्ध में या तो मारेंगे या मारेंगे ) , गंगाजल का पान करके, शरीर पर इत्र का छिड़काव करके ,श्रीमद् भाग गीता जी का पाठ करके, अपने दोनो हाथो में तलवार लेकर दुर्ग के प्रांगण में एकत्रित हुए। सभी युद्ध को लेकर आती उमंग और उत्साह से है है महाकाल , हर - हर महादेव के जयकारे लगाने लगे । राव जयमल ने सबको अम्ल पान करवाया।
इसके बाद तो मानो सभी क्षत्रिय राजपूत वीर युद्ध में शत्रुओं के प्राण लेने को उतावले हो उठे और उनके उत्साह की मानो कोई सीमा है नहीं रही।
जयमल जी के चलने फिरने में असमर्थता परन्तु उनका साहस व युद्ध की तीव्र इच्छा देख कर कल्लाजी राठौर ने अपने प्रिय काका जी की इच्छा पूरी करने का दृढ़ संकल्प लिया , और उनको अपने कंधो पर बिठा कर युद्ध करने का आग्रह किया क्यूंकि उनको यह ज्ञात था कि ये युद्ध उनका अंतिम युद्ध है।
25 फरवरी 1568 की सुबह सभी रण बांकुरों ने अपने दोनो हाथो मे तलवार लेकर दुर्ग के द्वार खोल दिया और अकबर की सेना पर भूखे शेरो की भांति आक्रमण कर दिया। पूरी युद्ध भूमि है जय महाकाल और जय एकलिंग नाथ के जयकारों से गूंज उठी।
सभी 8000 हिन्दू योद्धा 1000-1000 की टुकड़ियां में बंट गए।
वहीं वीर कल्लाजी और राव जयमल जी के चतुर्भुज रूप और उनके दोनो हाथो मे तलवार मतलब कुल चार हाथ और 4 तलवारे हो गईं , उनका ये विकराल रूप जहां जहां से गुजर रहा था ,उन्होंने दुश्मनों को गाजर मूली की भांति काटना शुरू कर दिया, उनकी चारों तलवारें बिजली की गति से चलने लगीं। देखते ही देखते युद्ध भूमि मुगल लाशों से पट गयी। दुश्मन सेना में भय फैल गया की हिन्दुओं की सेना की तरफ से कोई देवता युद्ध कर रहा है, और मुग़ल सेना उनको देख कर युद्ध भूमि से दूर भागने लग गई।
अकबर ने यह देखा, तो उसे लगा कि दो सिर और चार हाथ वाला कोई देवता युद्ध कर रहा है। युद्ध में वे दोनों बुरी तरह घायल हो गये। अथवा जयमल जी के सैकड़ों घाव लगाने से उनका शरीर शांत होने लग गया वा निष्चेष्ट हो गया। यह आभास होते ही कल्ला जी ने जयमल जी के शरीर को नीचे उतारकर भैरवपोल नामक स्थान पर धरती पर लिटा दिया; और पुनः युद्ध करने लगे , वे पूरे वेग से शत्रुओं का संहार करते जा रहे थे, पर इसी समय एक शत्रु सैनिक ने पीछे से हमला कर उनका सिर काट दिया। सिर कटने के बाद के बाद भी उनका धड़ बहुत देर दोनो हाथों में तलवार लेकर मुग़ल सैनिकों को मारता रहा।
ऐसा दृश्य देख कर शत्रु सेना उनका रास्ता छोड़ कर खड़ी हो गई।
जब अकबर ने यह दृश्य अपनी आंखों पर विश्वास ना हुए, क्यूंकि उसने तो ये सब राजपूतों के बारे सिर्फ सुना ही था, परन्तु ये सब देखने के बाद अकबर को उन सभी कहानियों पर विश्वास हुआ की राजपूत अपना सर करने के बाद भी लड़ता है। ये देखने के बाद अकबर सदा के लिए भयभीत हो गया। इसके बाद सभी 8000 राजपूतों की सेना वीरगति को प्राप्त हो गई।
कल्लाजी के इस साहस को देख कर अकबर के भय का आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि, इस युद्ध के बाद अकबर ने कभी किसी युद्ध की अगुवाई नहीं करी ।
अपनी पत्नी को दिए हुए वचन(कल्लाजी जी विवाह संपन्न होते ही युद्ध के लिए निकल गए, कल्लाजी ने युद्ध में जाने से पहले अपनी पत्नी को वचन दिया था कि वे पुनः आकर मिलेंगे ) को पूरा करने के लिए कल्लाजी का धड़ घोड़े पर बैठ कर युद्ध भूमि से होता हुआ रानिला में अपनी पत्नी के पास पहुंचने के लिए रवाना हो गए।
वहीं कल्लाजी की पत्नी कृष्णकांता जी को अपने तपोबल से ज्ञात हो गया कि कल्लाजी वीरगति को प्राप्त हो गए हैं। ज्ञात होते ही वे सोलह श्रृंगार करके अपने पति के आने की प्रतीक्षा कर रहीं थी कल्लाजी के आते ही उनकी पत्नी ने जब ये देखा तो उन्होंने कल्लाजी के धड़ पर गंगाजल का छिड़काव किया और कल्लाजी ने अपना वचन पूरा करते ही अपनी देह त्याग दी और उनका धड़ शांत होकर भूमि पर गिर पड़ा ।
देवी कृष्णकांता जी ने अपने स्वामी के अदम्य शौर्य को देख कर गौरवान्वित होकर एक राजपूतानी होने के नाते सती करने का निश्चय किया । और सती के लिए चंदन का लेप करके चंदन की चिता तैयार करवाई अथवा कल्लाजी के शरीर को अपनी गोद में लेकर चिता पर हाथ जोड़ कर ईश्वर का ध्यान करते हुए बैठ गईं और इनके पश्चात कल्लाजी के भाई ने ईश्वर का स्मरण कर चिता मे आग लगा दी और ऐसे ही देवी कृष्णकांता महा सती हुईं।


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